Wednesday, 10 July 2013

UNTITLED

1. हर  कदम  बढ़े  , करे  मंजिल  को पास ,
कदम -कदम  पर  घटे , न लक्ष्य  की ये  आस । 
दूर है  मगर  पास आ  रही , बुझा  रही  है चाह  की  ये  प्यास । 
कदम  कभी  डिगे नहीं  इस  राह से , अर्श  से  फर्श  पर गिरोगे लक्ष्य  की बाँह  से ॥ 

2. उड़ रहा  है एक   परिंदा  आँधियों  के सामने ,
     ताकत न हो मगर  हौसला होगा जरुर । 
    गर बहती  रही  नदी इस तरह से ,
    तय होगा समंदर तक का  फासला  जरुर ॥