Wednesday, 4 September 2013

विश्रामस्थल पर लेटे हुए

विश्रामस्थल पर लेटे हुए ,
कुछ सोचता जाता हूँ ।

ज़िन्दगी की समीक्षा में ,
स्वयं को झकझोरता जाता हूँ ।

कौन है ये ,
पहचानने के प्रयत्न में ,
उसके प्रतिबिम्ब को अपने मन पर ,
छापता जाता हूँ ।

एक सुन्दर सी काया है ,
सब उसी की माया है ,
दिन हो या रात हो ,
सुबह हो या सांझ हो ,
बस एक यही सुर मैंने गाया है ।

मेरे दिल में ,
दिमाग में बस ,
तेरा ही विचार आया है ।

कैसे मान लूँ ,
कि तू है मुझसे अलग ,
जब इन नयनों को तुझे देखकर ,
एक ही एहसास आया है ।

नहीं जानता हूँ कि ,
किस रस्ते पर चलूँ ,
कि  तुझ तक पहुच सकूं ।
न जाने किस रस्ते पर तेरे ,
पदचिन्हों की छाया है ।
तू ही है कि  एक सुन्दर सी काया है ।
तू ही तो बस मेरे नयनों में समाया है ।
बस तेरा ही तो मुझ पर साया है ।

Ankur Shukla
 1:49 AM, Aug 19,2013.