Friday, 7 February 2014

संगठन गढ़े चलो सुपंथ पर बढे चलो

यह कविता हमारे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की एक बार का  मासिक गान है । तब मै कक्षा १० में पढ़ा करता था । हमारा विद्यालय विद्याभारती  के अंतर्गत ही आता है। विद्या भारती संघ के माध्यम से शहरों और गावों में विद्यालयों के द्वारा  "वसुधैव कुटुंबकम " और देशभक्ति संगठन के भाव को घर घर पहुचाने  का काम करती है। यह कविता तब से ही मेरी मनपसंद कविता है । आज काफी दिनों के पश्चात मेरे मन मस्तक में इस गीत के कुछ शब्द गूँज गए तुरत ही मैंने सोचा क्यूँ न आप सभी को इस देश भक्ति और संगठन के भाव से परिपूर्ण गीत से परिचित कराऊँ...

 
संगठन गढ़े चलो सुपंथ पर बढे चलो ,
भला हो जिसमें देश का वो काम सब किये चलो । । 
युग के साथ मिलकर सब कदम बढ़ाना सीख लो ,
एकता के स्वर में गीत गुनगुनाना सीख लो ,
एकता के स्वर में गीत गुनगुनाना सीख लो ,

भूल कर भी मुख में जाति पंथ कि न बात हो ,
भाषा प्रान्त के लिए कभी न रक्तपात हो ,
फूट का भरा घड़ा है फोड़ कर बढे चलो,
संगठन गढ़े चलो सुपंथ पर बढे चलो ,
भला हो जिसमें देश का वो काम सब किये चलो ,
भला हो जिसमें देश का वो काम सब किये चलो । । 

आ रही है आज चारों  से यही पुकार ,
हम करेंगे त्याग मातृभूमि के लिए अपार ,
हम करेंगे त्याग मातृभूमि के लिए अपार ,
कष्ट जो मिलेंगे मुस्करा के  सहेंगे हम ,
देश के लिए सदा जियेंगे और मरेंगे हम ,
देश का ही भाग्य अपना भाग्य है ये सोच लो ,
संगठन गढ़े चलो सुपंथ पर बढे चलो ,
भला हो जिसमें देश का वो काम सब किये चलो ,
भला हो जिसमें देश का वो काम सब किये चलो । । 



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