Monday, 29 September 2014

मेरी ज़िन्दगी

ये ज़िन्दगी क्या सिखाती है ,
इस दुनिया के गुलदस्ते में तुम्हे
कैसे सजाती है ,
कुछ ऐसे पल आएंगे ,
जहाँ कुछ कर नहीं सकते ,
और यूँ ही मर नहीं सकते ,
हँस  नहीं सकते , रो भी नहीं सकते,
यूँ देखकर जी नहीं सकते ,
ज़हर का घूंट पी नहीं सकते ।

अभी बहुत कुछ बाकी  है,
ये दुःख तो कुछ पलों की झांकी है ,
ये सिलसिले यूँ  ही चलते आये हैं ,
इन इक्कीस बरसों  में ,
कई बार आँसू  भी टपकते आयें हैं ।

पर हर पल से एक सबक लेना सिख गया हूँ ,
दुनिया के दुःख लेना सिख गया हूँ ।
जो चाहता जिस चीज़ को जितनी शीघ्रता से ,
वही भागता है उससे उतनी तीव्रता से ।
जो इनके पीछे भागना बंद पाये ,
और जिसको ये ज़िन्दगी न लुभाये ,
कुछ कर पाने की लालसा हो जिसके मन में ,
और ताकत और हिम्मत हो तन में ,
उसको यूँ ही जीना पड़ता है ,
हर गम का घूँट पीना पड़ता है ।

अभी इस धरती पर इतना वक़्त नहीं है गुजरा ,
पर दुखों के नाच का यही है मुजरा ,
ज़िन्दगी को सवाँरना सीखना पड़ता है ,
वरना उसे बिगड़ते देख चीखना पड़ता है ।

अभी वक़्त है , सवाँर लो ,
इस कविता के मर्म को पहचान लो ।
अभी तो तुम जवान हो ,
हष्ट पुष्ट और बलवान हो ,
अक्ल से भी बुद्धिमान हो ,
इस बात को जेहन में उतार लो ,
सभी को ख़ुशी बांटों ,
और उन के गम उधर लो ।
(BOPB)