Wednesday, 1 October 2014

असमंजस

गांधी जयंती के अवसर पर गांधी जी के विचारों से ओत - प्रोत इस कविता के माध्यम से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को मेरा प्रणाम.......


ये दुनिया देखती है  मुझे ,
पूछती है , कहती है ,

क्या किया तूने ए पथिक दुनिया के लिए ,
मै भी असमंजस में हूँ ,
कि स्वयमेवादी बनूँ या समाजवादी बनूँ ,
खुद के लिए कुछ करूँ कि दुनिया के लिए बनूँ ।

ये दुविधा थी तो बड़ी मेरे लिए ,
पर समाधान बहुत छोटा मिला ,
कि न स्वयमेवादी का विचार हो ,
न समाजवादी का हो ,
आत्मचिंतन और आत्ममंथन का सवाल हो ,

क्या हो तुम ,
क्यों हो तुम ,
गर ये पता हो जाये तुम्हे ,
तब ही कुछ बात हो ।

सभी आश्वस्त होंगे तुमसे ,
अगर तुमने ये कर दिखाया ,
अंत में  फिर भी एक प्रश्न रहेगा तुमसे ,
क्या , क्यों तुमने ये कैसे पाया ?