Wednesday, 17 December 2014

और एक मुस्कान - 2

"और एक मुस्कान " रात के स्वप्न में प्रारम्भ हुई इस कविता का ,इस अंक में , मैं अरुणोदय से मिलाप करा रहा हूँ , जहाँ एक नयी मुस्कान ने जन्म लिया है।


जीवन बाँटने के लिए एक जीवन...
आस बटोहती  आँखें ,
एक खुला हुआ हाथ , एक बढ़ा हुआ हाथ ,
एक बूँद पानी ,
मुस्काते हुए होंठ ,
तृप्त होने का एहसास ,
अरुणोदय की गर्माहट ,
कलियों की खिलखिलाहट ,
और एक मुस्कान...

-- अंकुर शुक्ल
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Monday, 10 November 2014

और एक मुस्कान

रात कभी पूर्ण नहीं होती ,

हमेशा होती है चूँकि मै कहता हूँ ,

चूँकि मैं आश्वासन देता हूँ ,

दुःख के अंत में एक खुली हुई खिड़की ,

हमेशा होता है एक स्वप्न जो जागता रहता है ,

पूरी करने के लिए इच्छा , तृप्त करने की क्षुधा ,

एक उदार मन ,

एक बढ़ा हुआ हाथ , एक खुला हुआ हाथ ,

ध्यान देती आँखे ,

जीवन बाँटने के लिए एक जीवन....


-- अंकुर शुक्ल
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Saturday, 18 October 2014

स्वच्छता अभियान : निर्मल भारत की ओर एक कदम


पिछले कुछ दिनों से हम भारत में स्वच्छता अभियान की बातें सुन रहे हैं । यह अभियान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिवस पर श्रीमान नरेंद्र मोदी जी ने प्रारम्भ किया है । यह अभियान नागरिकों की मानसिकता को परिवर्तित करने का अनोखा तरीका साबित हो सकता है , यदि सही से कार्यान्वित किया जाय ।

भारत की जो विश्व भर में साफ सफाई को लेकर छवि है , वह विचार करने योग्य है । इसका कारण हम सभी नागरिक हैं । हम अपने घर  साफ स्वच्छ रखना चाहते हैं , परन्तु सार्वजानिक स्थलों को जैसे कूड़ा-खाना ही समझते हैं । सार्वजानिक स्थलों को स्वच्छ रखना भी हम नागरिकों का कर्तव्य है , जब हम यह बात अपने मस्तिष्क में बैठा लेंगे , तब जाकर प्रधानमंत्री जी के स्वच्छता अभियान को सफलता मिलेगी ।

एक घटना, इसी तथ्य  जुड़ी हुई , कहीं पढ़ रहा था मैं । एक भारतीय महानुभाव एक बार पेरिस की यात्रा पर गए परन्तु भारतीय लक्षणों को भारत में न छोड़ सका । सड़क पर चलते चलते एक बार किसी वस्तु के पैकेट को यूँ ही सड़क पर फेंक दिया । उधर से एक महानुभाव ने बड़ी ही सहज़ता से उसे उठाकर कूड़ेदान में डाला और उन्होंने यह कार्य उतनी ही ख़ुशी और सहज़ता से किया , कि जैसे यह उनका दैनिक कार्य हो । हमें इन बातों , इन कथाओं , इन घटनाओं से सीख लेनी चाहिए । एतैव  तातपर्य यह ही है कि हमें अपने विचारों को बदलकर देश के  हित में सोचना होगा ।

और सिर्फ समस्या स्वच्छता की ही नहीं है , कूड़ा निस्तारण की भी है। कैसे और कहाँ , साफ़ सफाई से निकले कूड़े को रखा जाय ? कैसे इसे प्रयोग किया जाय ? भारत में इसकी भी बड़ी समस्या है । प्रधानमंत्री जी को स्वच्छता अभियान के साथ साथ solid  waste management पर भी कार्य करने की आवश्यकता है ।

विभिन्न देश कूड़े का उपयोग उर्वरक तथा बिज़ली उत्पादन में कर रहें हैं , भारत में कही भी ऐसा बड़ा सयंत्र नहीं है । बल्कि यहाँ कूड़े को शहरों के बाहर एक बड़े स्थान पर डम्प करते हैं । इन डंपिंग प्लेसेस के आस पास रहने वाले लोगों में कूड़े के ढेर की वजह से विभन्न प्रकार की बीमारियां फैलती हैं । वहां की उपजाऊ जमीन , रिसने वाले द्रव्य के कारण बंजर भूमि में बदल रही है । ये केवल तथ्य नहीं है , इन बातों के ठोस आकड़ें मौजूद हैं । विभिन्न संस्थाएं जैसे उनिसेफ के सर्वै में ये आकड़ें हमें रोज़ ही दीख पड़ते हैं । अतः प्रधानमंत्री जी से मेरा निवेदन है कि इस ओर भी अपना ध्यान आकर्षित करें ।

-- अंकुर शुक्ल
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Wednesday, 1 October 2014

असमंजस

गांधी जयंती के अवसर पर गांधी जी के विचारों से ओत - प्रोत इस कविता के माध्यम से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को मेरा प्रणाम.......


ये दुनिया देखती है  मुझे ,
पूछती है , कहती है ,

क्या किया तूने ए पथिक दुनिया के लिए ,
मै भी असमंजस में हूँ ,
कि स्वयमेवादी बनूँ या समाजवादी बनूँ ,
खुद के लिए कुछ करूँ कि दुनिया के लिए बनूँ ।

ये दुविधा थी तो बड़ी मेरे लिए ,
पर समाधान बहुत छोटा मिला ,
कि न स्वयमेवादी का विचार हो ,
न समाजवादी का हो ,
आत्मचिंतन और आत्ममंथन का सवाल हो ,

क्या हो तुम ,
क्यों हो तुम ,
गर ये पता हो जाये तुम्हे ,
तब ही कुछ बात हो ।

सभी आश्वस्त होंगे तुमसे ,
अगर तुमने ये कर दिखाया ,
अंत में  फिर भी एक प्रश्न रहेगा तुमसे ,
क्या , क्यों तुमने ये कैसे पाया ?

-- अंकुर शुक्ल
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Monday, 29 September 2014

मेरी ज़िन्दगी

ये ज़िन्दगी क्या सिखाती है ,
इस दुनिया के गुलदस्ते में तुम्हे
कैसे सजाती है ,
कुछ ऐसे पल आएंगे ,
जहाँ कुछ कर नहीं सकते ,
और यूँ ही मर नहीं सकते ,
हँस  नहीं सकते , रो भी नहीं सकते,
यूँ देखकर जी नहीं सकते ,
ज़हर का घूंट पी नहीं सकते ।

अभी बहुत कुछ बाकी  है,
ये दुःख तो कुछ पलों की झांकी है ,
ये सिलसिले यूँ  ही चलते आये हैं ,
इन इक्कीस बरसों  में ,
कई बार आँसू  भी टपकते आयें हैं ।

पर हर पल से एक सबक लेना सिख गया हूँ ,
दुनिया के दुःख लेना सिख गया हूँ ।
जो चाहता जिस चीज़ को जितनी शीघ्रता से ,
वही भागता है उससे उतनी तीव्रता से ।
जो इनके पीछे भागना बंद पाये ,
और जिसको ये ज़िन्दगी न लुभाये ,
कुछ कर पाने की लालसा हो जिसके मन में ,
और ताकत और हिम्मत हो तन में ,
उसको यूँ ही जीना पड़ता है ,
हर गम का घूँट पीना पड़ता है ।

अभी इस धरती पर इतना वक़्त नहीं है गुजरा ,
पर दुखों के नाच का यही है मुजरा ,
ज़िन्दगी को सवाँरना सीखना पड़ता है ,
वरना उसे बिगड़ते देख चीखना पड़ता है ।

अभी वक़्त है , सवाँर लो ,
इस कविता के मर्म को पहचान लो ।
अभी तो तुम जवान हो ,
हष्ट पुष्ट और बलवान हो ,
अक्ल से भी बुद्धिमान हो ,
इस बात को जेहन में उतार लो ,
सभी को ख़ुशी बांटों ,
और उन के गम उधर लो ।
(BOPB)

-- अंकुर शुक्ल
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Saturday, 27 September 2014

हिन्दी सप्ताह

"हिंदी हैं हम वतन हैं , हिन्दुस्तां हमारा ॥ "

१४ सितंबर , हिंदी दिवस, जैसे हिंदी को लोग सिर्फ आज के दिन ही याद कर रहे हैं । ये ऊपर लिखी पंक्तियों ने सब बयां कर दिया । अब तो भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की वो कविता याद आती है , जो हमने कक्षा छह में पढ़ी थी ;

"निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल । "

अर्थात अपनी भाषा की उन्नति ही सब  प्रकार की उन्नति की जड़ है । परन्तु आज के समय में अपनी इस भाषा को लोग  हिंदी दिवस पर भी हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ कहने के बजाय  "Happy Hindi Divas"  कह कर एक दूसरे को बधाईयाँ दे रहे हैं । अन्यथा कुछ लोग आज के दिन सिर्फ हिंदी लिखने का प्रण लेकर हिंदी का सम्मान करना चाहते हैं, जैसे भूले बिसरो को किसी एक दिन याद कर श्रद्धांजलि अर्पित करी जाती है । 

हिंदी भारत की आत्मा है । भारत में अभी भी ४० % जनसँख्या हिंदी भाषी है । पर हिंदी साहित्य इंग्लिश लिटरेचर के सामने भारत में दम तोड़ दिया है । इस पखवाड़े को हिंदी पखवाड़ा घोषित कर दिया है , पर फिर भी यह तथ्य किसी को न पता होगा , केवल हिंदी के नाम पर एक दिन स्मरण कर रहे हैं हम ।

हिंदी कितनी सुन्दर भाषा है , इसका ज्ञान उसे ही है जो उसे समझ पाया है , और समझाना तो जैसे हलवा , परन्तु आज के भारतीय पर हिंगलिश का प्रभुत्व  स्थापित हो गया है । पर कुछ ही जने है  शुद्ध हिंदी को बचाये हुए है , मैं तो आप सब भारतीयों से केवल एक प्राथर्ना करना चाहता हूँ कि अपनी माँ जैसी भाषा को विकसित करने के लिए एक कदम अवश्य बढ़ाएं ।

धन्यवाद !!

-- अंकुर शुक्ल
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Tuesday, 24 June 2014

आह्लाद

अभी कुछ वर्षो में जो घटनायें सामने आई हैं , उनसे सभी का मन आहत हुआ ही है । ऐसे ही एक दिन , यूँ ही  , बैठे बैठे सोच रहा था कि  कैसे , आखिर कैसे होते हैं , वो लोग जो ऐसी अमानवीय घटनाओं को अंजाम देते हैं । केवल वाकया सुनने भर से दिल सहम जाता है । जिस पर बीतती होगी , उसकी भावनाओं को महसूस कर इस कविता में पिरोने की कोशिश कर रहा हूँ ।

इसे रंग दूँ तो ऐसा लगे ,
जैसे वीरानों में रंग भर रहा हूँ ,
और मातम में गम भर रहा हूँ ,
वो चिल्ला रही है ,
कई घरों में माँ  उसे सहला रही है ,
कितना दर्द है , कितना दुःख है ,
उसकी आवाज़ में ,
न जाने कहाँ से आ रही है ।

ये पीड़ा कितनी भयंकर होगी ,
जो मैं केवल कल्पना में भी सहन न कर पाया ,
पर मेरे अंदर के जानवर ने ही उसे जन्माया ,
आखिर कब ये अत्याचार ख़त्म होगा ।
आखिर कब, ये आह्लाद ख़त्म होगा ।

कब समझेंगे हम ,
कि वो भी इंसान है ,
सोच को सम्भालों यारों ,
सोच से ही जगता ये हैवान है ।

कह तो रहा हूँ ,मै  कितनी आसानी से ,
पर ये जो कुभावना है ;
इसका मज़ा सबके लिए ,
देखो कितना लुभावना है ,
करते हैं लोग नशे में शायद ,
पर हसते तो होश में हैं ,
और बाद में करते हैं कवायद ,
क्या है ,
क्यों नहीं समझते तुम ,
क्या कहूँ मैं ,
कैसे समझाऊं ,
सबके पास मेरी वाद का ,
प्रतिवाद है ।
पर इसके लिए मैं ,
यूँ चुप नहीं बैठ सकता ,
हैवान की हवस को ,
बेजान नहीं देख सकता ,
तलवार नहीं हाथ में तो क्या ,
कलम भी कभी तलवार से काम रही है ,
कर तो कुछ भी न पाया इन हाथों से ,
लिखना तो मेरे बस में अभी भी है ।

गर ये कविता ,
आपके ह्रदय में कहीं वार करे ;
देखना कहीं आस - पास  कोई ,
किसी की ज़िन्दगी न बर्बाद करे ।


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Sunday, 15 June 2014

अभी तो आये थे ,

This poem is devoted to all my seniors, Farewell!!

अभी तो आये थे ,
अभी जाना हो गया ,
फिर से जैसे नयी ज़िन्दगी का बहाना हो गया  

अंतिम वर्ष , कॉलेज का आखिरी साल ,
 रोमांचकता से भरपूर पर अब कुछ अजीब सा लगता है
 ख़ुशी भी है और दुःख भी पर ऐसा क्यों
ये चार साल जिनकी यादें भुलाई नहीं जा सकती ,
 बस यही ख़त्म होने कि कगार पर हैं ,
 ये दोस्त जिनके साथ मैंने ज़िन्दगी का सबसे अच्छा समय बिताया ,
 इनका साथ बस यही तक था
 अब इनके साथ वे अठखेलियाँ याद आएँगी ,
 वो बक-बक भरी बातें याद आएँगी ,
 वो भीड़ से भरा कॉमन रूम ,
जिसमे एक छक्का पड़ते ही चीखने कि आवाज़ गूंज जाती थी ,
 सब आज जाने को है   
अब एक नयी ज़िन्दगी ,
नयी जगह हमारा इंतज़ार कर रही है ,
 सभी के लक्ष्य अलग हैं ,
जाना तो सभी को अपने रस्ते ही है
ज़िन्दगी भी क्या चीज़ है ,
कुछ को पास लाती है ,
 कुछ दूर हो जाता है।
अब तो सिर्फ फेसबुक और व्हाट्सप्प का सहारा रह जायेगा ,
अब होंठों के बजाय , अंगुलियां और अगूंठे चलेंगे
पर वो कहते है ना ,(कोई और नहीं कहता सिर्फ मै  ही कहता  हूँ);

कुछ पाना है तो कुछ खोना पड़ेगा  
इस दुनिया में हंस हंस के रोना पड़ेगा  

अरे , अभी कुछ ज्यादा भावनाओं में बह गया ,
 पर ख़ुशी भी इस बात की  है कि मैं एक कदम और आगे बढ़ा हूँ
 इस ज़मीनी धरातल पर अब अपने पैरों पर खड़ा हूँ ,

दुआ करता हूँ कि इस कॉलेज ने जो मुझे दिया , मैं भी इसको तिनका भर लौटा सकूँ  



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Saturday, 19 April 2014

नया चुनावी परिदृश्य

इस साल के वोटिंग परसेंटेज को देखकर सभी हैरान हैं , रिकॉर्ड दर रिकॉर्ड टूटते जा रहे हैं । आखिर इस बार ही ऐसा क्यों हुआ ? हाँ इस बार युवाओं ने खूब हाथ आजमाया है । पर क्या किसी ने भी सोचा था की कभी अपनी समस्याओं में उलझा रहने वाला युवा , आज इतनी बड़ी मात्रा में देश की समस्याओं में रूचि दिखाने लगेगा । आज मेरे दिमाग में ये बातें उथल पुथल कर रहीं थीं । तब मैंने इन गौर करना शुरू किया कि आखिर इस सब की शुरुआत कहाँ से हुई , क्यों युवाओं ने इस बार चुनावी रण में प्रथम पंक्ति की तरह भाग लिया । कई विचार आये मन में , पर सबसे शक्तिशाली विचार अपने प्रभाव से इस कदर प्रभावित कर गया की मेरा मन गदगद हो गया । आपको क्या लगता है , क्या हो सकता है ?

हुआ यूँ कि ये सब सोशल मीडिया की करामात है । इस टेक्नोलॉजी के युग के युवा सोशल मीडिया से इस गहराई से जुड़े हुए हैं , कि अगर आप उनके दिल पर छाप छोड़ना चाहते हैं , तो बस एक बार फेसबुक पर अपनी छाप छोड़ दीजिये । अब वो तलवार तो सोशल मीडिया है, जिसने युवाओं को चुनावी रन में उतरने के लिए मजबूर किया , मजबूर कहना ठीक न होगा बल्कि उत्साहित किया ।  अब बात यह आती है , कि  शुरुआत कहाँ से हुई और किसने की , जरा सोचें तो सिर्फ एक नाम याद आता है , भारतीय जनता पार्टी और कुछ समाचार पत्र । बीजेपी ने ही सबसे पहले सोशल मीडिया पर अपने पैर पसारने प्रारम्भ किये । मैं बीजेपी का कोई बड़ा प्रशंसक या पार्टी का कोई कार्यकर्ता नहीं  हूँ मगर ये बात जाने अनजाने में सभी ने स्वीकार की है । अब उस शुरुआत का परिणाम देखिये कि  चुनाव में भाग लेने वाले , मत डालने वालों की संख्या में वृद्धि हुई है , हाँ इसमें इलेक्शन कमीशन का भी एक बड़ा योगदान रहा है परन्तु चुनाव आयोग का अभियान बहुत काम समय के लिए होता है । ये भी एक तरह से विकास ही है कि  भारत की जनता सही तरीके से अपने मत का उपयोग कर रही है । 

मैं तो इससे हैरान हूँ , कि  पार्टी ने न चाहते हुए भी भारत के युवा में राजनीति की एक लहर दौड़ा दी । आज कल फेसबुक पर लोग अपनी पार्टी या जिसे भी वे सपोर्ट करते हैं , उस पर , उनकी नीतियों पर , स्वच्छ पहलु पर , बुरे पहलु पर बहस करते हैं , देश को इससे लाभ हो रहा है , मेरा तो बस यही मत है । मैं एक उदारवादी व्यक्ति हूँ , प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी रूप से किसी राजनितिक पार्टी का प्रबल समर्थक नहीं हूँ , परन्तु हाँ नरेंद्र मोदी जी का व्यक्तिगत रूप से प्रंशसक भर हूँ , इसके भी बहुत कारण हैं । पर जिस व्यक्ति ने जाने अनजाने में भी देश के लिए भलाई का काम कर दिया , सच में उसका प्रंशसक होने में मैं कोई बुराई नहीं समझता । अब आप देख लीजिये सिर्फ व्हाट्सप्प , फेसबुक का सहारा नहीं लिया गया , ट्विटर और कुछ नए सोशल मीडिया को भी जन्म दिया गया , India272+ ,IndianCAG Group ऐसे ऑनलाइन ग्रुप्स को जन्म मिला , जिन्होंने देश के युवाओं को आपस में जोड़ने का काम किया । अपने विचारों पर बहस करने का एक मंच दिया और सभी को बराबर अवसर दिया । सच में आज सोचने पर ताज्जुब होता है । 

पत्रकारों की बातों को ही लूँ अगर तो उन्होंने भी मन है कि  इस बार चुनावी रणनीति में सोशल मीडिया ने अपनी खूब भागीदारी निभायी है । और अगर आप सिलसिला यहाँ ख़त्म नहीं करना चाहते तो , आप को बता दूँ , जहाँ तक मैं जनता हूँ , कि  चार - पांच  राज्य जहाँ की राज्य सरकार बीजेपी की है , गुजरात , मध्य प्रदेश ,गोवा ,छत्तीसगढ़ और उड़ीसा (बीजेपी और बी जे दी की गठबंधन की सरकार )। अगर आप इन सभी सरकारों के कार्यकाल और कार्य की एनालिसिस करेंगे तो आप पाएंगे की यहाँ की सरकारें स्थायित्व के साथ -साथ , अपने प्रदेश को विकास के नए रथ बैठाये हुए आगे बढ़ रही हैं । 

पर दुःख इस बात का है की राजनीति कुछ लोग ये दंगो और हिन्दू -मुस्लमान से आगे ही नहीं बढ़ पाये । युवा किसी में भेद नहीं करता , चाहे हिन्दू हो या मुस्लिम अब वो अपने को भारतीय कहना पसंद करता है । मुझे लगता कि  इस राजनितिक मुद्दे को यही इसी चुनावी माहौल के साथ ख़त्म कर देना चाहिए । 

एक और बात जो मेरे मन है आप के समक्ष रखना चाहूंगा , मैं अरविन्द केजरीवाल जी का भी व्यक्तिगत रूप से प्रंशसक हूँ , पर उनकी नयी पार्टी के कामकाज से अभी तक प्रभावित नहीं हुआ । मैंने सोचा था कि ये कुछ नयी तरह के तरीके अपनाएंगे जनता को प्रभावित करने के लिए , पर ये भी पुरानी नीतियों पर ही चल पड़े हैं । चुनावी माहौल  में दूसरे की गलतियां गिनना , अपनी बड़ाई करना तथा अन्य की बुराई , वर्षों से सब की यही रीति रही है ,अब आप भी यही करोगे , यह उम्मीद नहीं थी । फिर भी केजरीवाल जी का प्रयास सराहनीय रहा है , यह बात लिखने के लिए मैं तो अनुभव में अभी बहुत छोटा व्यक्ति हूँ , पर विचारों के आगे मजबूर हूँ । आशा करता हूँ कि  इस तरह से जो मैं अपनी बात आपके ह्रदय तक पहुँचाना छह रहा था , उसमे सफल रहा होऊंगा । 

जय हिन्द जय भारत ॥ 


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Wednesday, 26 March 2014

WHO I AM?

Who I Am?
मैं कौन ? हाँ मैं कौन ? कौन हूँ मैं ? मुझे ही नहीं पता । आज मुझसे यह प्रश्न पूछा गया और मैं स्तब्ध सा रह गया । मुझे क्या हुआ , मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कौन हूँ ? पूरा शरीर थर्रा सा गया , इस प्रश्न का उत्तर न मिला । अरे, मैं जानता हूँ मैं अंकुर हूँ ,अंकुर शुक्ल । पर कौन अंकुर ? कौन जानता  है इस पहचान को ।
मैंने अपनी ज़िन्दगी के २० साल निकल दिए पर अभी तक इसका उत्तर नहीं ढूंढ पाया , बस करियर के रथ पर सवार बढे जा रहा हूँ , जहाँ इस रथ कि बघ्घी में बधें  घोड़े लिए जा रहे हैं । कहने को तो बहुत कुछ है , बहुत कुछ अर्जित भी किया इस ज़िन्दगी में , पर फिर इस प्रश्न पर स्तब्ध ।

तुम कौन ?
इस दुनिया की  धुंध में ,
इस विश्व के झुण्ड में ,
तुम कौन ?



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Thursday, 20 February 2014

दुनिया को ज़रूरत है हमारी

कभी  कभी ज़िन्दगी में कुछ ऐसी घटनाएं घटती हैं जिनसे हमें बहुत कुछ सिखने को मिलता है । हर व्यक्ति के साथ कभी कहीं कुछ ऐसा होता ज़रूर है जिससे कि वह दिल से , दिमाग से जुड़ जाता है बिना कुछ सोचे समझे भावुक हो जाता है ,और जब जज्बात से परे जाकर , दिलो दिमाग से , मस्तिष्क कि परिकल्पनाओं को किनारे रख कर , उन बातो और लम्हो पर गौर करता है , तो कुछ और ही दीख पड़ता है । अभी तक के ज़िन्दगी के सफ़र में जो भी अनुभव मुझे मिला उन्ही अनुभवों में से कुछ पल इस प्यारी सी कविता में पिरोने की कोशिश है ।

आपने तो सिर्फ अपना ही सोचा ,
हमें तो बस य़ू  ही कोसा ।
ये कहकर कि तुम याद न आओ ,
तुम्हे देखकर बस रोना आता है ,
आपके मुख से मुखर इन शब्दों से ,
याद उन क्षणों का एक कोना आता है ।

हम तो चाहते हैं आप यूं ही खुश रहे ,
ज़िन्दगी भर सारी  खुशियाँ तुम्हे मिलती रहें ।
हर शाम आपकी , यूं ही ख़ुशी से ढलती रहे ।

अपना क्या है , निपट ही जायेगा ,
धक्के से गाड़ी का पहिया कीचड़ से निकल जायेगा ॥

हम मुकाम की  तरफ बढ़ चले हैं ,
नामुमकिन सी दिखने वाली पहाड़ी पर चढ़ चले हैं ,
बस यही तमन्ना है हमारी ,
दुआ देना , दुनिया को ज़रूरत है हमारी ॥


10:53 AM ,Nov 29,2013

Friday, 7 February 2014

संगठन गढ़े चलो सुपंथ पर बढे चलो

यह कविता हमारे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की एक बार का  मासिक गान है । तब मै कक्षा १० में पढ़ा करता था । हमारा विद्यालय विद्याभारती  के अंतर्गत ही आता है। विद्या भारती संघ के माध्यम से शहरों और गावों में विद्यालयों के द्वारा  "वसुधैव कुटुंबकम " और देशभक्ति संगठन के भाव को घर घर पहुचाने  का काम करती है। यह कविता तब से ही मेरी मनपसंद कविता है । आज काफी दिनों के पश्चात मेरे मन मस्तक में इस गीत के कुछ शब्द गूँज गए तुरत ही मैंने सोचा क्यूँ न आप सभी को इस देश भक्ति और संगठन के भाव से परिपूर्ण गीत से परिचित कराऊँ...

 
संगठन गढ़े चलो सुपंथ पर बढे चलो ,
भला हो जिसमें देश का वो काम सब किये चलो । । 
युग के साथ मिलकर सब कदम बढ़ाना सीख लो ,
एकता के स्वर में गीत गुनगुनाना सीख लो ,
एकता के स्वर में गीत गुनगुनाना सीख लो ,

भूल कर भी मुख में जाति पंथ कि न बात हो ,
भाषा प्रान्त के लिए कभी न रक्तपात हो ,
फूट का भरा घड़ा है फोड़ कर बढे चलो,
संगठन गढ़े चलो सुपंथ पर बढे चलो ,
भला हो जिसमें देश का वो काम सब किये चलो ,
भला हो जिसमें देश का वो काम सब किये चलो । । 

आ रही है आज चारों  से यही पुकार ,
हम करेंगे त्याग मातृभूमि के लिए अपार ,
हम करेंगे त्याग मातृभूमि के लिए अपार ,
कष्ट जो मिलेंगे मुस्करा के  सहेंगे हम ,
देश के लिए सदा जियेंगे और मरेंगे हम ,
देश का ही भाग्य अपना भाग्य है ये सोच लो ,
संगठन गढ़े चलो सुपंथ पर बढे चलो ,
भला हो जिसमें देश का वो काम सब किये चलो ,
भला हो जिसमें देश का वो काम सब किये चलो । । 



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Wednesday, 29 January 2014

A tribute to Mahatma Gandhi

“Generations to come will scarcely believe that such a one as this walked on the earth in flesh and blood.”
–Einstein
The above quotation by Einstein was said as a tribute to Mahatma Gandhi, arguably the most influential man of the 20th century. He helped change the fate of millions of people around the globe. When one looks at the major movements of the 20th century- viz anticolonialism, anti apartheid, non violence, and movement against untouchability ( the last one a uniquely Indian social evil)- Gandhi was the motive force/ originator behind all these major movements. And it goes without saying that these movements helped change the destiny of millions of people and scores of nations around the globe.

Jaagriti was a children’s movie produced just 6 years after the death of Mahatma Gandhi and its story was full of high ideals and great hopes for the future of India. All the songs of this movie were full of patriotic fervour and zeal for nation building. The song “aao bachchon tumhe dikhaaye jhaanki Hindustan ki” from this same movie has almost become another national anthem which is nearly as popular as the official national anthem and song.
Here is a tribute to the great man from the movie “Jaagriti” (1954). The lyrics is by Pradeep and Music is by Hemant Kumar. This song is sung on the screen by a school kid. Those days playback for kids was given by female singers. Kids singing for kids was not yet in vogue. Thus we find here Asha Bhonsle singing this song for a school boy. The lyrics go a bit overboard,but then it shows how the lyricist Pradeep viewed Gandhi in those heady days when the country had just acquired independence.
So on the occassion of 30th january,Martyrs' day of Mahatma Gandhi, I present this song -” Dedi hamen aazaadi bina khadg bina dhaal” to the readers of this blog.
Song- dedi hamen aazaadi bina khadg bina dhaal ( Jaagriti) (1954) Singer-Asha Bhosle, Lyrics- Pradeep, MD- Hemant Kumar
lyrics
de di hamen aazaadi binaa khadg binaa dhaal
Sabarmati ke sant tuune kar diyaa kamaal
de di hamen aazaadi binaa khadg binaa dhaal
Sabarmati ke sant tuune kar diyaa kamaal
aandhi mein bhi jalti rahi Gandhi teri mashaal
Sabarmati ke sant tune kar diyaa kamaal
de di hamen aazaadi binaa khadg binaa dhaal
Sabarmati ke sant tuune kar diyaa kamaal
dharti pe ladi tune ajab dhang ki ladaai
daagi na kahin top na bandook chalaai
dushman ke kile par bhi na ki toone chadhaai
waah re fakir khoob karaamaat dikhaai
chutki mein dushmanon ko diyaa desh se nikaal
Sabarmati ke sant tune kar diyaa kamaal
de di hamen aazaadi binaa khadg binaa dhaal
Sabarmati ke sant tuune kar diyaa kamaal
Raghupati Raaghav Raajaa Raam
shatranj bichhaa kar yahaan baithaa thaa zamaanaa
lagtaa thaa mushkil hai firangi ko haraanaa
takkar thi bade zor ki dushman bhi tha taanaa
par tu bhi thaa Baapu bada ustaad puraanaa
maaraa wo kas ke daanv ke ulti sabhi ki chaal
Sabarmati ke sant tune kar diyaa kamaal
de di hamen aazaadi binaa khadg binaa dhaal
Sabarmati ke sant tuune kar diyaa kamaal
Raghupati Raaghav Raajaa Raam
jab jab teraa bigul bajaa jawaan chal pade
mazdoor chal pade the aur kisaan chal pade
Hindu au Mussalmaan, Sikh Pathaan chal pade
kadmon pe teri koti koti praan chal pade
phoolon ki sej chhod ke daude Jawaaharalaal
Sabarmati ke sant tune kar diyaa kamaal
de di hamen aazaadi binaa khadg binaa dhaal
Sabarmati ke sant tuune kar diyaa kamaal
Raghupati Raaghav Raajaa Raam
man men thi ahinsaa ki lagan tan pe langoti
laakhon mein ghoomtaa thaa liye satya ki sonti
waise to dekhne mein thi hasti teri chhoti
lekin tujhe jhukti thi himaalay ki bhi choti
duniyaa mein tu bejod tha insaan bemisaal
Sabarmati ke sant tune kar diyaa kamaal
de di hamen aazaadi binaa khadg binaa dhaal
Sabarmati ke sant tuune kar diyaa kamaal
Raghupati Raaghav Raajaa Raam
jag mein koi jiyaa hai to Baapu tu hi jiyaa
toone watan ki raah mein sab kuchh lutaa diyaa
maangaa na koi takht na to taaj bhi liyaa
amrit diyaa to theek magar khud zahar piyaa
jis din teri chitaa jali, royaa thaa mahaakaal
Sabarmati ke sant tune kar diyaa kamaal
de di hamen aazaadi binaa khadg binaa dhaal
Sabarmati ke sant toone kar diyaa kamaal
Raghupati Raaghav Raajaa Raam
Raghupati Raaghav Raajaa Raam
Raghupati Raaghav Raajaa Raam