Monday, 29 September 2014

मेरी ज़िन्दगी

ये ज़िन्दगी क्या सिखाती है ,
इस दुनिया के गुलदस्ते में तुम्हे
कैसे सजाती है ,
कुछ ऐसे पल आएंगे ,
जहाँ कुछ कर नहीं सकते ,
और यूँ ही मर नहीं सकते ,
हँस  नहीं सकते , रो भी नहीं सकते,
यूँ देखकर जी नहीं सकते ,
ज़हर का घूंट पी नहीं सकते ।

अभी बहुत कुछ बाकी  है,
ये दुःख तो कुछ पलों की झांकी है ,
ये सिलसिले यूँ  ही चलते आये हैं ,
इन इक्कीस बरसों  में ,
कई बार आँसू  भी टपकते आयें हैं ।

पर हर पल से एक सबक लेना सिख गया हूँ ,
दुनिया के दुःख लेना सिख गया हूँ ।
जो चाहता जिस चीज़ को जितनी शीघ्रता से ,
वही भागता है उससे उतनी तीव्रता से ।
जो इनके पीछे भागना बंद पाये ,
और जिसको ये ज़िन्दगी न लुभाये ,
कुछ कर पाने की लालसा हो जिसके मन में ,
और ताकत और हिम्मत हो तन में ,
उसको यूँ ही जीना पड़ता है ,
हर गम का घूँट पीना पड़ता है ।

अभी इस धरती पर इतना वक़्त नहीं है गुजरा ,
पर दुखों के नाच का यही है मुजरा ,
ज़िन्दगी को सवाँरना सीखना पड़ता है ,
वरना उसे बिगड़ते देख चीखना पड़ता है ।

अभी वक़्त है , सवाँर लो ,
इस कविता के मर्म को पहचान लो ।
अभी तो तुम जवान हो ,
हष्ट पुष्ट और बलवान हो ,
अक्ल से भी बुद्धिमान हो ,
इस बात को जेहन में उतार लो ,
सभी को ख़ुशी बांटों ,
और उन के गम उधर लो ।
(BOPB)

-- अंकुर शुक्ल
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Saturday, 27 September 2014

हिन्दी सप्ताह

"हिंदी हैं हम वतन हैं , हिन्दुस्तां हमारा ॥ "

१४ सितंबर , हिंदी दिवस, जैसे हिंदी को लोग सिर्फ आज के दिन ही याद कर रहे हैं । ये ऊपर लिखी पंक्तियों ने सब बयां कर दिया । अब तो भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की वो कविता याद आती है , जो हमने कक्षा छह में पढ़ी थी ;

"निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल । "

अर्थात अपनी भाषा की उन्नति ही सब  प्रकार की उन्नति की जड़ है । परन्तु आज के समय में अपनी इस भाषा को लोग  हिंदी दिवस पर भी हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ कहने के बजाय  "Happy Hindi Divas"  कह कर एक दूसरे को बधाईयाँ दे रहे हैं । अन्यथा कुछ लोग आज के दिन सिर्फ हिंदी लिखने का प्रण लेकर हिंदी का सम्मान करना चाहते हैं, जैसे भूले बिसरो को किसी एक दिन याद कर श्रद्धांजलि अर्पित करी जाती है । 

हिंदी भारत की आत्मा है । भारत में अभी भी ४० % जनसँख्या हिंदी भाषी है । पर हिंदी साहित्य इंग्लिश लिटरेचर के सामने भारत में दम तोड़ दिया है । इस पखवाड़े को हिंदी पखवाड़ा घोषित कर दिया है , पर फिर भी यह तथ्य किसी को न पता होगा , केवल हिंदी के नाम पर एक दिन स्मरण कर रहे हैं हम ।

हिंदी कितनी सुन्दर भाषा है , इसका ज्ञान उसे ही है जो उसे समझ पाया है , और समझाना तो जैसे हलवा , परन्तु आज के भारतीय पर हिंगलिश का प्रभुत्व  स्थापित हो गया है । पर कुछ ही जने है  शुद्ध हिंदी को बचाये हुए है , मैं तो आप सब भारतीयों से केवल एक प्राथर्ना करना चाहता हूँ कि अपनी माँ जैसी भाषा को विकसित करने के लिए एक कदम अवश्य बढ़ाएं ।

धन्यवाद !!

-- अंकुर शुक्ल
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