Friday, 1 May 2015

मुसाफिर

दिये जलते हैं
दिए बुझते हैं
रौशनी होती है
अँधेरा जाता है
गम जाते है
ख़ुशी आती है
बस हम वहीँ रह जाते हैं ।
जहाँ से शुरू हुआ था ये कारवां
ठहरा है वहीँ पर है
कश्ती कहाँ है
किसको पता है
जाना कहाँ है
किसको पता है
बस चले जा रहे है
एक मुकाम हासिल हुआ है अभी तो
कुछ पल यहाँ भी सही
फिर तो जाना है वहीँ ||

-- अंकुर शुक्ल
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