Sunday, 20 September 2015

एक ही चाहत

कहते कहते हम कुछ कह गए ,

जो आप तक ना पहुंचा ,

आँखों से सुनने की जुर्रत न की आपने ,

होंठों को सीए हम रह गये ।


बुना तो बहुत कुछ था सपनों में हमने ,

दिए जले थे दिलो - दमाग में ,

एक हवा के झोकें से ,

बुझ के रह गये । 


बनायीं तो थी हमने मिलकर एक कहानी ,

पर वक्त की वास्तविकता में ,

कच्चे घड़े से ढह गये ।


हम इंतज़ार किस घड़ी का कर रहे थे ,

कि सुईयों की भूलभुलैया 

में ही फँस के रह गये । 


संदेशा भी भेजा ,

कोशिश भी करी बताने की उन्हें ,

बस एक उत्तर के इंतज़ार में ही रह गये ।


अपने व्यहार ,

और सही समय के इंतज़ार ,

बस समय की मार में ही बह गये । 


अब भी आसरा है हमें ,

बुनते हैं ख्वाब अभी भी ,

कि तुम्हारे साथ , दुनिया से परे ,

प्रेम के सागर में बह गये ।

एक ही चाहत है,

कि  कुछ पल के लिए

इन भावनाओं की गुत्थी तुम पर गिर गये ।

-- अंकुर शुक्ल 

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