Monday, 1 May 2017

मेरी नींद

​दो रातों से नींद उड़ी है,
सोने की बहुत कोशिश की पर,
सोने ही नहीं दिया 
रात ने ।
अब आप पूछोगे ऐसा क्या हुआ,
यही तो 
माजरा है,
कि आखिर हुआ क्या है।
या फिर 
बहुत कुछ हुआ है।
इतना पढ़ के ही 
जो जानने मानने वाले लोग है,
पूछे बिना नहीं रहेंगे 
पूछने का मकसद ये नही 
कि सच में 
चिंता है,
क्योंकि चिंता तो चिता के समान है।
पर पूछना तो बनता है,
क्योंकि उन्हें पता है,
या फिर 
नही भी पता फिर 
भी कहीं न कहीं से तार तो जोड़ ही लेंगे।
पर ये भी सही ही है,
दोस्त- दोस्त की चिंता न करे 
तो कौन करे भला।
पर उसमें से कुछ दिखावा भी है।
चलो छोड़ो,
बात नींद की है,
बहुत तुक्के लगाए,
बहुत जुगाड़ अपनाये,
पर कुछ न हुआ।
शायद कुछ ऐसा हुआ है,
जो आंखों से नींद को,
ही अगवा कर ले गया है।
अभी तक तो कोई,
फिरौती का फ़ोन नहीं आया,
पर इंतज़ार है मुझे।
ओह्ह, शायद कुछ अंदाज़ा लगा,
कुछ प्रेम पुजारियों ने कहा है,
कि दिल लगा तो,
नींद उड़ जाती है।
और कुछ आशिक़ों ने कहा है,
कि दिल टूटा
तो उड़ जाती है।
और भी है,
मनोविज्ञानी ने बोला 
कुछ नही इनसोमनिया है।
अब किस किस पर 
विश्वास करूं।
ये कुछ नहीं जानते शायद।
चलो इंतज़ार करते हैं,
ये कविता सुनने के बाद शायद,
मेरी नींद मेरे पास लौट आये,
या फिर 
वो जो मेरी नींद चुरा ले गया है 
वो लौट आये।
हो सकता है
फोन ही आ जाये,
फिरौती के बदले ही सही,
लौटा दे,
मेरी नींद।
- अंकुर शुक्ल ( 1 मई 2017, सुबह 3:03)
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Thursday, 13 April 2017

कौन हो तुम -2

अस्तित्व से लड़ाईयाँ चलती रहेंगी, जब तक इस दुनियां में हो। कुछ इन्ही लड़ाईयों से दो पंक्तियों की कविताएं निकलती हैं और यहां छप जाती हैं, तो उन्ही पुरानी लाइनों को आगे बढ़ा रहा हूँ,

कौन हो तुम,
चोर
क्या कीमती वस्तु है तुम्हारे पास,
मेरा व्यक्तित्व।

- अंकुर शुक्ल ( 13 अप्रैल 2017, शाम 3:02)

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Saturday, 8 April 2017

कौन हो तुम

जब कभी अस्तित्व को लेकर झगड़ा होता है मेरा खुद से, तो शायद ऐसी कुछ पक्तियां लिख देता हूँ। शांत तो मन तब भी नहीं होता बल्कि कुछ विचार योग्य प्रसंग और जुड़ जाते हैं। देखते हैं अगर आपके साथ भी कुछ ऐसा ही होता है या नहीं,
कौन हो तुम,
मैं
मैं नहीं हूं,
अस्तित्व जिससे था,
वो ही नहीं है अब।
-अंकुर शुक्ल (8 अप्रैल, 12:58 दोपहर) 
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Friday, 7 April 2017

प्यार बिकता है यहां

कभी कभी कुछ भी सोचते सोचते कुछ गंभीर विषयों के कुएं में डुबकी लगा जाता हूँ । उन्ही कुछ पलों से कुछ व्यंगात्मक रंग निकलते और कागज पर फैल जाते हैं। शायद स्वतः ही एक लेखक के आत्म चिंतन से उत्पन्न छोटे छोटे शब्द कोरे पन्नों पर रूप लेते है। उन्ही कुछ शब्दों से गठित ये कविता शायद कहीं आपके अंतर्मन से कुछ सवाल करे, कि क्या सच के प्यार प्रेम बिकता है इस दुनिया में,


प्यार बिकता है भई यहाँ पर,
दाम बोलो तो लेलो,
कई तरह के है,
वो डीप लव वाला चाहिए
या फिर बस वो थोड़ा ऊपर ऊपर वाला,
और अगर कुछ अंतरंगिनिया चाहिए ,
तो समझ लो कुछ ज्यादा ही खरच हो जाएगा।
साइज भी बता दो,
वो स्माल पाउच जो 2-3 महीने चले वो दें,
या वो 2-3 साल वाला बड़ा पाउच ।
अरे डब्बा ही चाहिए क्या ,
ये भी दो टाइप का है,
छोटा जो 5-6 साल तक बाँधे रखेगा,
और बड़ा वाला जिंदगी भर के लिए तुमसे
पूछेगा क्यों किया ये तूने अपने साथ।
और अगर उससे भी न बने तो बताओ,
पौधा भी है,
वो मिल गया तो समझो,
प्यार से ऊपर वाले बंधन में बंध गए।
तो देखो
गर पसंद आये कुछ दिल को
तो प्राइस टैग पर लिखा है,
कितनी भावनाएं और आहें खर्चनी होगीं।।

-अंकुर शुक्ल (7 अप्रैल 2017, दोपहर 2:30)

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Sunday, 2 April 2017

प्यार बिकता है भई यहाँ पर

प्यार बिकता है भई यहाँ पर,
दाम बोलो तो लेलो,
कई तरह के है,
वो डीप लव वाला चाहिए
या फिर बस वो थोड़ा ऊपर ऊपर वाला,
और अगर कुछ अंतरंगिनिया चाहिए ,
तो समझ लो कुछ ज्यादा ही खरच हो जाएगा।
साइज भी बता दो,
वो स्माल पाउच जो 2-3 महीने चले वो दें,
या वो 2-3 साल वाला बड़ा पाउच ।
अरे डब्बा ही चाहिए क्या ,
ये भी दो टाइप का है,
छोटा जो 5-6 साल तक बाँधे रखेगा,
और बड़ा वाला जिंदगी भर के लिए तुमसे
पूछेगा क्यों किया ये तूने अपने साथ।
और अगर उससे भी न बने तो बताओ,
पौधा भी है,
वो मिल गया तो समझो,
प्यार से ऊपर वाले बंधन में बंध गए।
तो देखो
गर पसंद आये कुछ दिल को
तो प्राइस टैग पर लिखा है,
कितनी भावनाएं और आहें खर्चनी होगीं।।

--Ankur Shukla
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KAHANI SHURU HUI THI, RUK SI GYI...

Dil me utha tha jo umanngo ka sagar,
Tham sa gaya hai,
wo hawa ki sondhi si khusbu,
kahan gum ho gayi,
wo chandrama ki sheetal roshni,
mit si gayi,
kahani shuru hui thi,
ruk si gayi.
mere sapno ko par lag gaye the,
kahan ud chale the wo,
unhe pata tha nhi,
unhe pata tha nhi,
ud ke aana hai yahin.
yhi apna aasra hai,
tujhe khud ka hi sahara milega,
kisi se yachana chhod de,
kisi ko janchana chhod de,
ye duniya badi dhongi hai,
apne aansoo bahana chhod de,
ye aansoo bade kimti hai,
yu muskrana chhod de,
muskrane ke din hote bade kam hai,
yu khilkhilana chhod de.
kahani shuru hui thi,
ruk si gayi.

--Ankur Shukla
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SOLDIER


If I die in a war zone,
ßox me up n send me home,
Put my gun on my chest,
N tell my mom i did my best,

N tell my dad not to bow,
He will never get tension
from me now,
Tell my ßro study perfectly,
Keys of my bike will be his
permanently,
Tell my sis dont be upset,
Her bro will not rise after this
sunset,
Dont tell my friends they are
hearties,
N start 2 ask for parties,
Tell my love not to cry...
"COZ IM A Solider.. ..BORN 2
DIE..."

--Ankur Shukla
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दिल में उठा था जो उमंगो का सागर

दिल में उठा था जो  उमंगो का सागर ,
थम सा गया है ,
वो हवा की सोंधी सी खुशबु ,
कहाँ गम हो गयी ,
वो  चन्द्रमा की शीतल रोशनी ,
मिट सी गयी,
कहानी शुरू हुई थी,
रुक सी गयी। 
मेरे सपनो को पर लग गए थे,
कहाँ उड़ चले थे वो,
उन्हें पता था नही,
उन्हें पता था नही,
उड़ के आना है यहीं। 
यही अपना आसरा है,
तुझे खुद का ही सहारा मिलेगा,
किसी से याचना छोड़ दे,
किसी को जांचना छोड़ दे,
ये दुनिया बड़ी ढोंगी है,
अपने आंसू बहन छोड़ दे,
ये आंसू बड़े कीमती हैं,
यु मुस्कुराना छोड़ दे,
मुस्कुराने के दिन होते बड़े काम हैं,
यूँ खिलखिलाना छोड़ दे ,
कहानी शुरू हुई थी रुक सी गयी। 


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Our 68th Independence Day

"Vande mataram" What a word. जैसे ही यह शब्द आपके मुख से स्वरित होता है , जैसे 
वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलाम्
मलयजशीतलाम्
शस्यशामलाम्
मातरम्।

शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम्।। १।। वन्दे मातरम्।

सप्त[5]-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले।
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं
रिपुदलवारिणीं मातरम्।। २।।
वन्दे मातरम्।

तुमि विद्या, तुमि धर्म
तुमि हृदि, तुमि मर्म
त्वम् हि प्राणा: शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गडि
मन्दिरे-मन्दिरे

त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादायिनी,
नमामि त्वाम्
नमामि कमलाम्
अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलाम् मातरम्।। ४।।
वन्दे मातरम्।

श्यामलाम् सरलाम्
सुस्मिताम् भूषिताम्
धरणीं भरणीं मातरम्।। ५।।
वन्दे मातरम्।।



-- अंकुर शुक्ल
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तुम भी एक पहचान

ज़िन्दगी की राहों में आगे तो बढ़ जायेंगे ,
बस आपको याद करते जायेंगे।
कहाँ से चले थे ,
इसकी किसे खबर ,
बस आपसे मिले ,
और कुछ पल में आसमां पर थे।
क्या किया आपने ,
जो हम में विश्वास आया ,
कुछ कर दिखाने का अहसास आया,
इस एहसास ने हमें सिफर से शिखर तक पहुँचाया ।
आज याद करता हूँ वह समय ,
तो मस्तिष्क में उभरते हैं वे शब्द ,
कर्कश तीरों की  तरह चुभते थे हृदय पर ,
ये अहसास तो था ही न मुझमें ,
कि एक दिन ज्ञात होगा ,
वे कर्कश तीर नहीं , नीर हैं,
जो हमें उस ऊँचाई  पर पहुँचा रहा है ,
मीठा अमृत है ,
वो तक़दीर नहीं ,
आपकी मेहनत है ,
जो हम में आग जलाती है ,
अंधकार की  लौ बुझाती  है ,
हमें विश्वास दिलाती है,
कि तुम ही हो ,
भूल जाओ दुनिया , संसार को ,
अपने लिए करो ,
और खुद ही भरो ,
क्यों कोसते हो दूसरों को ,
माता को , पिता को ,
अध्यापक और भगवान को ,
भगवान नहीं तो सरकार को ,
उठो , तुम महान  हो ,
तुम ही देश का उठान हो ,
चलते हुए आग पर ही ,
तुम्हे मंज़िल मिलेगी ,
तो क्या सोचते हो ?
अपने पैरों में बंधी जंजीर को तोड़ो ,
अपने आखों में बंधी पट्टी उतारो ,
इक नया इतिहास लिख डालो ,
इक सपना तुम्हे पुकार रहाहै ,
पूरा कर उसे इस विश्व को दिखला दो ,
कि तुम भी इक इंसान हो।
कि तुम भी एक पहचान हो॥

-- अंकुर शुक्ल
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कौन हूँ मैं

कौन हूँ मैं 

It’s been a while that I posted any post on this blog, but I promise to myself and you all today that from now on I will be posting everyday celebrating the national month of poetry April. It’s all starts today, This is an old poem, I did a video on this also. You will find a link below to my youtube channel. Make sure you subscribe for more good Hindi poems. 

एक तालाब में कैद मछली हूँ मैं,
अँधेरे में कहीं गुम,
कठपुतली हूँ मैं,
कौन नचा रहा ,
कौन नाच रहा ,
इसकी फ़िक्र किसे है ,
बस अपने पात्र में ,
कहीं गुम एक अभिनेता हूँ मैं । 

एक कविता है जो मेरे सरे रूपों को वास्तविकता से मिलती है , मेरी ही वाणी में पूरी कविता सुनने के लिए नीचे की वीडियो देखें। अच्छी लगे तो LIke एंड Subscribe करें , और हाँ क्रिटिकल comments जरूर करें । 
 

--अंकुर शुक्ल (२ अप्रैल २०१७ ४:१३ शाम )

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Saturday, 1 April 2017

बहुत दिन हुए कुछ लिखा नहीं

बहुत दिन हुए कुछ लिखा नहीं
आज शायद कुछ लिख दूँ ,
पर क्या माजरा तो ये है ,
अब तो कलम उठाने की जरुरत नहीं है ,
टेक्नोलोजी जो आ गयी है
रिप्लेस कर दिया सारा
पुराना जमाना , परंपरागत तरीका ॥
हिंदी में कलम से मोतियों को कागज पर उतरने के बजाए
अब तो बस  वर्डप्रेस खोलो
और गूगल के उपकार से
गूगल इनपुट टूल का उपयोग करके
कविता को यूँ ही लिख डालो ॥
कवी तो अपनी कविता का कभी ड्राफ्ट बनाते ही नहीं थे
अरे वो क्या कवी जो एक बार ड्राफ्ट बनाकर फिर कविता को पब्लिश करे
अरे अंकुर जी की सुने अगर, तो कविता तो एक भावना
बह गए तो बह गए ,
तभी उतार दिया जमीं पर उस कविता को तो सही,
वरना फिर एहसास होना तो मुश्किल है बाबू ॥
मैं तो बस यही करता हूँ,
जब मन मचला तो लिख डाली
ड्राफ्ट का चक्कर तो राइटर पालते हैं,
मैं तो एक सड़क किनारे खड़ा कवी हूँ,
पहचान लो तो सही, वरना क्या,
मैं तू यूँ ही कहानी कवितायेँ गढ़ता रहूँगा
अपने पथ पर चलता रहूँगा, आगे बढ़ता रहूँगा॥
--अंकुर शुक्ल (११:१४ शाम २२ दिसम्बर २०१६)

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