Saturday, 1 April 2017

बहुत दिन हुए कुछ लिखा नहीं

बहुत दिन हुए कुछ लिखा नहीं
आज शायद कुछ लिख दूँ ,
पर क्या माजरा तो ये है ,
अब तो कलम उठाने की जरुरत नहीं है ,
टेक्नोलोजी जो आ गयी है
रिप्लेस कर दिया सारा
पुराना जमाना , परंपरागत तरीका ॥
हिंदी में कलम से मोतियों को कागज पर उतरने के बजाए
अब तो बस  वर्डप्रेस खोलो
और गूगल के उपकार से
गूगल इनपुट टूल का उपयोग करके
कविता को यूँ ही लिख डालो ॥
कवी तो अपनी कविता का कभी ड्राफ्ट बनाते ही नहीं थे
अरे वो क्या कवी जो एक बार ड्राफ्ट बनाकर फिर कविता को पब्लिश करे
अरे अंकुर जी की सुने अगर, तो कविता तो एक भावना
बह गए तो बह गए ,
तभी उतार दिया जमीं पर उस कविता को तो सही,
वरना फिर एहसास होना तो मुश्किल है बाबू ॥
मैं तो बस यही करता हूँ,
जब मन मचला तो लिख डाली
ड्राफ्ट का चक्कर तो राइटर पालते हैं,
मैं तो एक सड़क किनारे खड़ा कवी हूँ,
पहचान लो तो सही, वरना क्या,
मैं तू यूँ ही कहानी कवितायेँ गढ़ता रहूँगा
अपने पथ पर चलता रहूँगा, आगे बढ़ता रहूँगा॥
--अंकुर शुक्ल (११:१४ शाम २२ दिसम्बर २०१६)

You can follow me here for more fun and intense poems:
Facebook: @ShuklaAnk94 (https://www.facebook.com/ShuklaAnk94/ )
Twitter: @Shukla_ank (https://twitter.com/shukla_ank )