Friday, 7 April 2017

प्यार बिकता है यहां

कभी कभी कुछ भी सोचते सोचते कुछ गंभीर विषयों के कुएं में डुबकी लगा जाता हूँ । उन्ही कुछ पलों से कुछ व्यंगात्मक रंग निकलते और कागज पर फैल जाते हैं। शायद स्वतः ही एक लेखक के आत्म चिंतन से उत्पन्न छोटे छोटे शब्द कोरे पन्नों पर रूप लेते है। उन्ही कुछ शब्दों से गठित ये कविता शायद कहीं आपके अंतर्मन से कुछ सवाल करे, कि क्या सच के प्यार प्रेम बिकता है इस दुनिया में,


प्यार बिकता है भई यहाँ पर,
दाम बोलो तो लेलो,
कई तरह के है,
वो डीप लव वाला चाहिए
या फिर बस वो थोड़ा ऊपर ऊपर वाला,
और अगर कुछ अंतरंगिनिया चाहिए ,
तो समझ लो कुछ ज्यादा ही खरच हो जाएगा।
साइज भी बता दो,
वो स्माल पाउच जो 2-3 महीने चले वो दें,
या वो 2-3 साल वाला बड़ा पाउच ।
अरे डब्बा ही चाहिए क्या ,
ये भी दो टाइप का है,
छोटा जो 5-6 साल तक बाँधे रखेगा,
और बड़ा वाला जिंदगी भर के लिए तुमसे
पूछेगा क्यों किया ये तूने अपने साथ।
और अगर उससे भी न बने तो बताओ,
पौधा भी है,
वो मिल गया तो समझो,
प्यार से ऊपर वाले बंधन में बंध गए।
तो देखो
गर पसंद आये कुछ दिल को
तो प्राइस टैग पर लिखा है,
कितनी भावनाएं और आहें खर्चनी होगीं।।

-अंकुर शुक्ल (7 अप्रैल 2017, दोपहर 2:30)

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