Sunday, 2 April 2017

तुम भी एक पहचान

ज़िन्दगी की राहों में आगे तो बढ़ जायेंगे ,
बस आपको याद करते जायेंगे।
कहाँ से चले थे ,
इसकी किसे खबर ,
बस आपसे मिले ,
और कुछ पल में आसमां पर थे।
क्या किया आपने ,
जो हम में विश्वास आया ,
कुछ कर दिखाने का अहसास आया,
इस एहसास ने हमें सिफर से शिखर तक पहुँचाया ।
आज याद करता हूँ वह समय ,
तो मस्तिष्क में उभरते हैं वे शब्द ,
कर्कश तीरों की  तरह चुभते थे हृदय पर ,
ये अहसास तो था ही न मुझमें ,
कि एक दिन ज्ञात होगा ,
वे कर्कश तीर नहीं , नीर हैं,
जो हमें उस ऊँचाई  पर पहुँचा रहा है ,
मीठा अमृत है ,
वो तक़दीर नहीं ,
आपकी मेहनत है ,
जो हम में आग जलाती है ,
अंधकार की  लौ बुझाती  है ,
हमें विश्वास दिलाती है,
कि तुम ही हो ,
भूल जाओ दुनिया , संसार को ,
अपने लिए करो ,
और खुद ही भरो ,
क्यों कोसते हो दूसरों को ,
माता को , पिता को ,
अध्यापक और भगवान को ,
भगवान नहीं तो सरकार को ,
उठो , तुम महान  हो ,
तुम ही देश का उठान हो ,
चलते हुए आग पर ही ,
तुम्हे मंज़िल मिलेगी ,
तो क्या सोचते हो ?
अपने पैरों में बंधी जंजीर को तोड़ो ,
अपने आखों में बंधी पट्टी उतारो ,
इक नया इतिहास लिख डालो ,
इक सपना तुम्हे पुकार रहाहै ,
पूरा कर उसे इस विश्व को दिखला दो ,
कि तुम भी इक इंसान हो।
कि तुम भी एक पहचान हो॥

-- अंकुर शुक्ल
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